अलमारी

आज बहुत दिनों बाद अलमारी खोली तुम्हारी…
और अंदरसे यादों की खुशबू आ गयी..
खुद को रोख न सकी तो देखा,
कुछ पुरानी किताबे है, लेकिन उन कागज पर लिखे
तुम्हारे लफ्ज उतनेही जवान…
एक तस्बीर मिली और उसमे तुम भी,
उस तस्बीर के रंग उतनेही नए लगे मगर तुम बूढ़े..
नीचे कुछ रखा है,
इक डिब्बा, जिसमे एक पुराना शिशा मिला,
देखा तो पता चला मैं भी अब बूढ़ी लग रही हूँ…
इतने मैं पीठ पर रखे हाथ को महसूस किया और
मुड़कर देखा… तो… सामने तुम खड़े हो, हाथ मैं फूल लेकर…
तुमने मेरे बालों में वो फूल लगा दिया और अब
वही पुराना शिशा कुछ नया दिख रहा है…
अलमारी तो अब बंद कर ली,
मगर नए पलों की खुशबू छा गयी….

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